खरी खरी संवाददाता

भोपाल, 28 मई।

सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा

इतना मत चाहो उसे वो बेवफ़ा हो जाएगा

जैसे शेरों के साथ अपनी शायरी मे नजाकत और नफासत के साथ जिंदादिली भरने वाले प्रख्यात शायद पद्मश्री बशीर बद्र को इदुज्जुहा के दिन भोपाल में इंतकाल हो गया। उसी शाम उन्हें भोपाल के बड़ा बाग कब्रिस्तान में सुपुर्द खाक कर दिया गया। करीब पांच साल से दुनिया में शायरी के इस बेताज बादशाह की कलम खामोश थी, क्योंकि वे याददाश्त खो देने वाली डेमेंशिया बीमारी की चपेट में आ गए। पांच साल बाद आज वह शायर खुद भी खामोश हो गया।

उर्दू अदब की दुनिया गुरुवार को उस वक्त गहरे सन्नाटे में डूब गई, जब मोहब्बत, तन्हाई और जिंदगी को अपनी गजलों में नई आवाज देने वाले मशहूर शायर पद्मश्री डॉ. बशीर बद्र ने हमेशा के लिए दुनिया को अलविदा कह दिया। बकरीद के दिन 91 वर्ष की उम्र में उन्होंने भोपाल के ईदगाह हिल्स स्थित अपने निवास पर अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर से साहित्य जगत, कला प्रेमियों और देश-दुनिया में फैले लाखों प्रशंसकों में शोक की लहर दौड़ गई। डॉ. बशीर बद्र लंबे समय से डिमेंशिया (स्मृतिलोप) और उम्र संबंधी बीमारियों से जूझ रहे थे। बीमारी के चलते उनकी स्मरण शक्ति लगभग खत्म हो चुकी थी और वे अपने करीबियों को पहचानने में भी असमर्थ हो गए थे। पिछले कुछ महीनों से उनकी तबीयत लगातार बिगड़ रही थी और उन्होंने सार्वजनिक जीवन से लगभग दूरी बना ली थी। पनी नफासत भरी शायरी और बेहद सरल अंदाज के कारण बशीर बद्र ने गजल को सिर्फ साहित्यिक मंचों तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि आम लोगों की जिंदगी का हिस्सा बना दिया। उनकी गजलों में रिश्तों की गर्माहट, बिछड़ने का दर्द, अकेलेपन की टीस और जिंदगी की सादगी बेहद खूबसूरती से झलकती थी। यही वजह रही कि उनकी पंक्तियां मुशायरों से निकलकर लोगों की जुबान और दिलों तक पहुंचीं। डॉ. बशीर बद्र 15 फरवरी 1935 को उत्तर प्रदेश के अयोध्या में जन्मे थे। उन्होंने  अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा और पीएचडी की पढ़ाई पूरी की थी। बाद में उन्होंने मेरठ कॉलेज में उर्दू विभागाध्यक्ष के रूप में लंबा समय बिताया और शिक्षा के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। डॉ. बशीर बद्र के हिंदी में एक दर्जन से अधिक गजल संग्रह प्रकाशित हुए, जबकि उर्दू में उनके सात चर्चित संग्रह साहित्य जगत की अमूल्य धरोहर माने जाते हैं। उनकी कई मशहूर पंक्तियां आज भी लोगों की यादों में जिंदा हैं और नई पीढ़ी के शायरों के लिए प्रेरणा बनी हुई हैं।

उनके निधन पर देशभर के साहित्यकारों, शायरों और सांस्कृतिक जगत से जुड़े लोगों ने गहरा दुख व्यक्त किया है। परिवार में उनके बेटे तैयब और पत्नी डॉ. राहत हैं। डॉ. बशीर बद्र के जाने के साथ उर्दू शायरी का एक ऐसा दौर समाप्त हो गया, जिसने अल्फाजों को एहसास की सबसे खूबसूरत शक्ल दी।

डा बशीर बद्र के चुनिंदा शेर 

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में

कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो।

अगर तलाश करूँ कोई मिल ही जाएगा,
मगर तुम्हारी तरह कौन मुझ को चाहेगा?

जाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।

आँखों में रहा, दिल में उतर कर नहीं देखा,
कश्ती के मुसाफ़िर ने समंदर नहीं देखा।