मंदिर मस्जिद विवाद पर संघ सुप्रीमो के बयान से देश में सियासी बहस

खरी खरी संवाददाता
नई दिल्ली, 2 जनवरी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सुप्रीमो डा मोहन भागवत ने मंदिर-मस्जिद को लेकर शुरू हुए नए विवादों पर तल्ख बयान देकर देश की सियासत में नई बहस छेड़ दी है। उन्होंने कहा कि अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के बाद कुछ लोगों को ऐसा लग रहा है कि वे ऐसे मुद्दे उठाकर हिंदुओं के नेता बन सकते हैं, जो कि उचित नहीं है।संघ प्रमुख ने मंदिर मस्जिद विवाद किसी भी तरह उठने पर एक तरह से चिंता जाहिर की है।
‘सहजीवन व्याख्यानमाला’ में ‘भारत-विश्वगुरु’ विषय पर व्याख्यान देते हुए उन्होंने समावेशी समाज की वकालत की और कहा कि भारत को दुनिया के सामने यह साबित करना होगा कि विविधता के बावजूद एक साथ सद्भावना से रहा जा सकता है। उनका यह बयान ऐसे वक्त में आया है जब उत्तर प्रदेश के संभल में सफाई अभियान के दौरान एक प्राचीन मंदिर के पास स्थित कुएं से खंडित मूर्ति निकली है औऱ उसे लेकर सियासी गर्माहट तेजी से बढ़ रही है। असल में मोहन भागवत ने भारतीय समाज की बहुलता को रेखांकित करते हुए रामकृष्ण मिशन में क्रिसमस के उत्सव का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि ऐसा केवल हिंदू समाज ही कर सकता है क्योंकि यह समाज सहिष्णुता और समावेशिता में विश्वास रखता है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारत को सद्भावना का एक मॉडल बनाना चाहिए ताकि दुनिया को प्रेरणा मिल सके। उन्होंने स्पष्ट किया कि राम मंदिर का निर्माण सभी हिंदुओं की आस्था का विषय था और ऐसे मुद्दों को बार-बार उठाकर समाज में विभाजन की अनुमति नहीं दी जा सकती। उन्होंने कहा कि हाल के दिनों में मंदिरों का पता लगाने के लिए मस्जिदों के सर्वेक्षण की मांगें अदालत तक पहुंच रही हैं, लेकिन यह प्रवृत्ति स्वीकार्य नहीं है। भागवत ने कहा कि भारत की व्यवस्था अब संविधान के अनुसार चलती है, जहां जनता अपने प्रतिनिधि चुनकर सरकार बनाती है। उन्होंने यह भी कहा कि अधिपत्य और कट्टरता के दिन खत्म हो चुके हैं। उन्होंने मुगल बादशाह औरंगजेब के शासन का उदाहरण देते हुए बताया कि कट्टरता के कारण समाज को नुकसान पहुंचा, लेकिन बहादुर शाह जफर जैसे शासकों ने गोहत्या पर प्रतिबंध लगाकर सद्भावना को बढ़ावा दिया। भागवत ने इतिहास का संदर्भ देते हुए कहा कि अयोध्या में राम मंदिर हिंदुओं को दिए जाने का निर्णय पहले ही लिया गया था, लेकिन अंग्रेजों ने दोनों समुदायों के बीच दरार पैदा कर दी। इस अलगाववाद की भावना ने अंततः पाकिस्तान के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया। उन्होंने यह भी कहा कि यदि सभी खुद को भारतीय मानते हैं तो फिर “वर्चस्व की भाषा” का इस्तेमाल क्यों किया जा रहा है।आरएसएस प्रमुख ने कहा कि भारत में सभी समान हैं और यहां अल्पसंख्यक तथा बहुसंख्यक के भेद का कोई स्थान नहीं है। उन्होंने भारतीय परंपरा का हवाला देते हुए कहा कि यहां हर किसी को अपनी पूजा पद्धति का पालन करने की स्वतंत्रता है। आवश्यकता इस बात की है कि सभी लोग नियमों और कानूनों का पालन करें और आपसी सद्भावना बनाए रखें।
संघ प्रमुख के इस बयान को लेकर सियासी हलचल मच गई है। सभी लोगों अपने अपने अनुसार इसका मंतव्य निकाल रहे हैं। इसे भाजपा के कुछ बड़े नेताओं की धार्मिक मुद्दों पर सक्रियता से जोड़कर देखा जा रहा है। भागवत के बयान का ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड के यासूब अब्बास ने स्वागत करते हुए इसे देश के लिए एक सकारात्मक कदम बताया।यासूब अब्बास ने वीडियो संदेश जारी कर कहा कि ‘मोहन भागवत का बयान बहुत अच्छा है। ये सेहतमंद सोच है। हर मस्जिद के नीचे मंदिर ढूंढने और मजार के नीचे शिवलिंग तलाशने की कोशिश करना बिल्कुल गलत है। यह सेहतमंद सोच नहीं है और इससे समाज में तनाव ही पैदा होता है।यासूब अब्बास ने कहा कि आरएसएस प्रमुख के इस बयान से देश में एक अच्छा माहौल पैदा होगा। यह सरकार की जिम्मेदारी है कि वह उन लोगों पर लगाम लगाएं, जो अपनी नेतागिरी चमकाने के लिए मंदिरों और मस्जिदों के बीच विवाद खड़ा कर रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ विदेशी ताकतें देश में सौहार्द को बिगाड़ने की कोशिश कर रही हैं। यह ताकतें एक तरफ हिंदू भाइयों को मंदिरों और शिवलिंगों की तलाश करने के लिए प्रेरित करती हैं, जबकि दूसरी तरफ मुसलमानों से अल्लाह हू अकबर का नारा लगाने और प्रदर्शन करने की कोशिश करती हैं। यह दोनों ही गलत हैं।