खरी खरी संवाददाता
नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके हर काम और योजना में मीन मेक निकालने वाले विरोधियों को नाराज फूफा बताया है। शनिवार को दिल्ली यूनिवर्सिटी के एक कॉलेज में हुए कार्यक्रम के दौरान विरोधियों पर जमकर निशाना साधा और कहा कि नाराज फूफाओं को देश की जनता जवाब देती है।
डीयू के श्री राम कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स (एसआरसीसी) के एक कार्यक्रम में उन्होंने ‘दिमागी नक्सल’ का एक बार फिर ज़िक्र किया। उन्होंने कहा, “आज 2013 के मुक़ाबले देश आर्थिक और सामाजिक रूप से कहीं ज़्यादा सुरक्षित है। लेकिन कुछ लोगों में बौखलाहट शुरू हो गई है। मैंने ऐसे लोगों के लिए लाल क़िले से 15 अगस्त को होम्योपैथी की गोली दी थी। तब मैंने एक शब्द कहा था- दिमाग़ी नक्सल।” “होम्योपैथी का इलाज बीमारी को कुछ समय के लिए और उभार देता है। जैसे ही मैंने ये गोली दी, सारे दिमाग़ी नक्सल बाहर आने लगे। मगर जनता उनका असली रंग देख रही है।” दरअसल, दिमाग़ी नक्सल को लेकर काफ़ी प्रतिक्रियाएं आईं और कुछ आलोचकों ने आरोप लगाया था कि सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने वाले युवाओं, बुद्धिजीवियों और विचारकों को ऐसे शब्दों से निशाना बनाया जा रहा है।
शनिवार को एसआरसीसी के शताब्दी समारोह के मौके पर यह कार्यक्रम आयोजित किया गया था।पीएम मोदी ने एसआरसीसी पहुंचने के लिए मेट्रो का इस्तेमाल किया, इस दौरान बच्चों से बात करते हुए उनकी तस्वीरें भी सामने आई हैं।इससे पहले पीएम मोदी ने एक्स पोस्ट में अपने कार्यक्रम की जानकारी दी और कॉलेज के योगदान का ज़िक्र किया। अपने संबोधित में पीएम मोदी ने विशेष तौर पर ऐसे शब्दों का इस्तेमाल भी किया जो जेन ज़ी के बीच पॉपुलर हैं। पीएम मोदी ने कहा कि डीयू के कॉलेजों में एसआरसीसी कहना ही अपने आप में एक ‘फ़्लैक्स’ होता है। उन्होंने कहा, “एसआरसीसी के एलुमनाई भी स्पेशल रहे। आपकी भाषा में भी कहूं तो यहां के एलुमनाई ओजी हैं, जिन्होंने एसआरसीसी का नाम दुनिया भर में पहुंचाया। यहां से निकले लोगों ने हर क्षेत्र में धूम मचाई है। वे धुरंधर भले न हों, पर धूम तो मचाई है।”
दरअसल, ओजी का इस्तेमाल जेन ज़ी अपनी बातचीत में आमतौर पर अनुभवी ओर सम्मानित व्यक्ति के लिए करती है। कार्यक्रम में मौजूद छात्र-छात्राओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, “कैंपस के बाहर आपको दो तरीक़े के लोग मिलेंगे।।। एक वो लोग जो सकारात्मक तरीक़े से समाज की शक्ति को राष्ट्र की शक्ति में बदलते हैं। दूसरी प्रजाति उन लोगों की है, जो कोई भी काम शुरू होने पर नाराज़ फूफ़ा बन जाते हैं। उनका फ़ेवरेट काम होता है हर काम का विरोध करना। उनका एक ही डायलॉग होता है।।। इसकी क्या ज़रूरत है।” उन्होंने कहा, “जब हम दुनिया का सबसे बड़ा स्टेच्यू बना रहे थे तब फूफा जी ने कमर कस ली, इसकी ज़रूरत क्या है। जब हमने हाई स्पीड ट्रेन पर काम किया तो फूफा जी बोले, इसकी ज़रूरत क्या है। जब यूपीआई लेकर आए तो फूफा बोले, इसकी ज़रूरत क्या है।” “हमने नई पार्लियामेंट बिल्डिंग बनाई तो फिर बोले, इसकी ज़रूरत क्या है। जब हमने हमारे वीर सेना नायकों का मेमोरियल बनाया तो फूफा फिर मैदान में आ गए, इसकी क्या ज़रूरत थी। लेकिन भारत ने ऐसे सारे फूफाओं को जवाब दिया। जो देश के लिए ज़रूरी है वो भारत को करने से कोई रोक नहीं सकता।”
