खरी खरी संवाददाता

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह महाकाल से अयोध्या तक यात्रा निकालने जा रहे हैं। इस यात्रा का केंद्र राम मंदिर में चढ़ावे की कथित चोरी का मुद्दा है। ऐसे में तो केवल एक राजनीतिक यात्रा मानना भी अधूरा होगा और केवल धार्मिक यात्रा मानना भी गलत होगा। सवाल यह है कि क्या भगवान के दरबार में उठाया गया कोई मुद्दा राजनीतिक लाभ में बदल सकता है? राजनीति के अपने तर्क हैं और आस्था के अपने। दोनों को एक-दूसरे की भाषा में समझने की कोशिश अक्सर उलटी पड़ती है। लेकिन एक बात तय है कि आस्था के दरबार मे सियासत का हिसाब मंहगा भी पड़ सकता है।

महाकाल से अयोध्या तक की यात्रा अपने आप में प्रतीकात्मक रूप से बहुत बड़ी है। उज्जैन का महाकाल और अयोध्या का राम मंदिर भारतीय जनमानस की गहरी धार्मिक आस्था से जुड़े हैं। ऐसे में यदि कोई राजनीतिक दल या नेता इन दोनों धार्मिक केंद्रों को जोड़ते हुए यात्रा करता है, तो स्वाभाविक रूप से उसके राजनीतिक संदेश की भी चर्चा होगी। लेकिन राम मंदिर के चढ़ावे की चोरी के आरोपों को लेकर जनता से समर्थन मांगना और भगवान के सामने हिसाब मांगना—इन दोनों के बीच एक महीन फर्क है, जिसे राजनीति अक्सर नजरअंदाज कर देती है।भारतीय परंपरा में भक्त भगवान के दरबार में हिसाब मांगने नहीं जाता। वह अपनी श्रद्धा अर्पित करता है, अपनी मनोकामना रखता है और अपने कर्मों का फल भगवान पर छोड़ देता है। मंदिर में चढ़ाया गया चढ़ावा किसी राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं, बल्कि श्रद्धालुओं की आस्था का प्रतीक होता है। इसलिए यदि चढ़ावे में गड़बड़ी या चोरी का कोई मामला सामने आता है तो उसकी जांच होनी चाहिए, दोषी मिले तो कार्रवाई भी होनी चाहिए। लेकिन इस पूरे विषय को राजनीतिक यात्रा का केंद्रीय मुद्दा बनाने से एक स्वाभाविक सवाल पैदा होता है—क्या यह श्रद्धा का प्रश्न है या सत्ता की राजनीति का?  यहीं दिग्विजय सिंह की यात्रा की सबसे बड़ी चुनौती दिखाई देती है।

राजनीति में मुद्दे उठाना लोकतंत्र का अधिकार है। भ्रष्टाचार हो, मंदिर की व्यवस्था में अनियमितता हो या किसी धार्मिक संस्था के धन का दुरुपयोग—इन पर सवाल उठना चाहिए। लेकिन जनता अब केवल यह नहीं देखती कि सवाल क्या है; वह यह भी देखती है कि सवाल पूछने वाला कौन है, किस समय पूछ रहा है और उसके पीछे उद्देश्य क्या है। राम मंदिर करोड़ों हिंदुओं की आस्था का विषय है। अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण लंबे संघर्ष और राजनीतिक इतिहास से जुड़ा रहा है। इसलिए मंदिर से जुड़े किसी भी विवाद को राजनीतिक चश्मे से देखने का खतरा हमेशा रहेगा। यदि कोई नेता मंदिर के चढ़ावे में कथित चोरी का मुद्दा उठाता है तो उसे यह भी स्पष्ट करना होगा कि उसकी लड़ाई मंदिर की पारदर्शिता के लिए है या इसके माध्यम से राजनीतिक जमीन तैयार करने के लिए। यही वह बिंदु है जहां धार्मिक भावनाओं और राजनीतिक रणनीति के बीच अंतर स्पष्ट होता है।भगवान के दरबार में भक्त चढ़ावा इसलिए नहीं चढ़ाता कि कुछ वर्षों बाद कोई राजनीतिक दल उसका हिसाब लेकर उसके सामने खड़ा हो। वह चढ़ावा इसलिए चढ़ाता है क्योंकि उसके भीतर आस्था होती है। वह मानता है कि उसकी श्रद्धा भगवान तक पहुंच रही है। इस विश्वास की पवित्रता को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से बचाना ही वास्तव में धर्म के प्रति सम्मान है। दिग्विजय सिंह जैसे अनुभवी नेता यह बात भली-भांति समझते हैं कि राजनीति में प्रतीकों का महत्व कितना बड़ा होता है। महाकाल से अयोध्या तक की यात्रा केवल किलोमीटर की यात्रा नहीं होगी, बल्कि यह हिंदू धार्मिक प्रतीकों के बीच राजनीतिक संवाद स्थापित करने की कोशिश के रूप में भी देखी जाएगी। लेकिन यही रणनीति उनके लिए सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती भी बन सकती है। यदि यात्रा का उद्देश्य भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाना है तो उसे किसी भी मंदिर, मठ या धार्मिक संस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही के व्यापक अभियान के रूप में प्रस्तुत करना अधिक प्रभावी होगा। अन्यथा विपक्ष इसे सीधे राजनीतिक स्टंट बताएगा और समर्थक इसे धार्मिक मुद्दे पर राजनीति के रूप में देख सकते हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जनता अब धार्मिक भावनाओं के राजनीतिक इस्तेमाल को पहले की तुलना में अधिक बारीकी से समझती है। केवल मंदिर जाना, धार्मिक यात्रा निकालना या भगवान का नाम लेना अपने आप में राजनीतिक समर्थन की गारंटी नहीं है। आस्था व्यक्तिगत होती है, जबकि राजनीति सार्वजनिक। दोनों का मिलन तभी सार्थक हो सकता है जब उसके पीछे ईमानदार उद्देश्य और स्पष्ट नैतिक आधार दिखाई दे।

इसलिए यह मान लेना कि महाकाल से अयोध्या तक की यात्रा अपने आप कांग्रेस या दिग्विजय सिंह को कोई बड़ा राजनीतिक लाभ दे देगी, जल्दबाजी होगी। राजनीतिक लाभ तभी संभव है जब जनता इस यात्रा को किसी व्यापक जनहित से जोड़कर देखे। केवल राम मंदिर के चढ़ावे की कथित चोरी को लेकर यात्रा निकालने से वह वर्ग भी सवाल कर सकता है जो मंदिर की व्यवस्था में पारदर्शिता चाहता है, लेकिन धार्मिक आस्था को राजनीतिक संघर्ष का हथियार बनते नहीं देखना चाहता।

अंततः मंदिर में चढ़ावा श्रद्धा है, निवेश नहीं; भक्ति है, राजनीतिक सौदा नहीं। भक्त भगवान को चढ़ाते समय यह नहीं सोचता कि कल किसी मंच से उसका हिसाब मांगा जाएगा। इसलिए यदि किसी मंदिर की व्यवस्था में भ्रष्टाचार या चोरी हुई है तो उसका हिसाब कानून और जांच एजेंसियों को लेना चाहिए, राजनीति को नहीं।

महाकाल से अयोध्या की यात्रा यदि वास्तव में आस्था और जनहित की यात्रा बनती है तो उसका स्वागत होना चाहिए। लेकिन यदि यह केवल राजनीतिक हिसाब-किताब की यात्रा बनकर रह जाती है तो संभव है कि रास्ता लंबा हो, भीड़ भी मिले, नारे भी लगें—लेकिन वह भावनात्मक जुड़ाव न बन पाए जिसकी राजनीति तलाश कर रही है। क्योंकि भगवान के दरबार में भक्त हिसाब मांगने नहीं जाता, वह अपना विश्वास चढ़ाता है। और राजनीति में सबसे कठिन चीज यही है—उस विश्वास को वोट में बदलने की कोशिश न करना।