खरी खरी संवाददाता

युवा पीढ़ी इस समय सारी दुनिया की सरकारों के लिए चुनौती बन रही हा। इस आक्रोशित भीड़ को जेन जी नाम दिया गया है। नेपाल जैसे हालात कई जगह बन रहे हैं, लेकिन कोई समाधान नहीं निकल रहा है। ऐसे में मध्यप्रदेश सरकार ने युवाओं के मन को पढ़ने का रास्ता निकाला है। प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव 6 अक्टूबर को भोपाल के लाल परेड मैदान में 20 हजार से अधिक युवाओं से सीधे संवाद करेंगे। ‘सीएम यूथ कॉन्क्लेव-2026’ के नाम से होने वाले इस बड़े आयोजन में रोजगार, कौशल विकास, स्टार्टअप, उद्यमिता, रिसर्च और भविष्य की तकनीकों को केंद्र में रखा गया है। 17 सरकारी विभागों और विभिन्न संस्थाओं की भागीदारी के साथ 80 से ज्यादा प्रदर्शनी स्टॉल लगाए जा रहे हैं। इनमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स, ड्रोन, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रिक वाहन और रिन्यूएबल एनर्जी जैसे क्षेत्र खास आकर्षण होंगे।

पहली नजर में यह एक सामान्य सरकारी युवा कार्यक्रम दिखाई देता है, लेकिन मौजूदा राजनीतिक माहौल में इसका अर्थ इससे कहीं बड़ा है। देश में Gen Z की राजनीतिक और सामाजिक सक्रियता बढ़ने के बाद सरकार, भाजपा, संघ और विपक्ष—सभी युवाओं तक सीधे पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में सवाल स्वाभाविक है कि क्या मुख्यमंत्री का यह युवा संवाद बदलते युवा मानस के साथ सामंजस्य बैठाने की कोशिश है? और क्या रोजगार, स्टार्टअप तथा नई तकनीक की भाषा युवाओं को सरकार की राजनीतिक भाषा से जोड़ पाएगी? पिछले कुछ महीनों में देश में युवा आंदोलनों ने यह संकेत दिया है कि नई पीढ़ी केवल राजनीतिक भाषण सुनने वाली पीढ़ी नहीं है। वह सवाल करती है, सोशल मीडिया पर अपनी राय बनाती और फैलाती है और जरूरत पड़ने पर सड़क पर भी उतर सकती है। हाल ही में हुए Gen Z से जुड़े आंदोलनों ने राजनीतिक दलों को यह समझने पर मजबूर किया है कि युवा मतदाता को केवल राष्ट्रवाद, विचारधारा या बड़े राजनीतिक नारों के जरिए लंबे समय तक प्रभावित नहीं किया जा सकता। रोजगार, परीक्षा व्यवस्था, भर्ती, पेपर लीक, शिक्षा की गुणवत्ता, अवसरों की समानता और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दे उसके लिए ज्यादा प्रत्यक्ष हैं।

इसलिए भाजपा ने भी अपने युवा संपर्क की भाषा में बदलाव किया है। हाल की रिपोर्टों के मुताबिक पार्टी ने ‘Gen Z’ शब्द के बजाय व्यापक ‘युवा’ शब्द के इस्तेमाल पर जोर देना शुरू किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर पार्टी संगठन तक सोशल मीडिया और नए डिजिटल फॉर्मेट के जरिए युवाओं से संपर्क बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। इसी कड़ी का एक हिस्सा डा मोहन यादव का युवा संवाद कार्यक्रम माना जा रहा है। यह यूथ कॉन्क्लेव केवल सरकारी योजनाओं की प्रदर्शनी भर नहीं माना जा सकता। इसका राजनीतिक महत्व भी है। मुख्यमंत्री जिस भाषा में युवाओं से संवाद करने जा रहे हैं, वह बदली हुई है। यहां परंपरागत राजनीतिक भाषणों की जगह AI, रोबोटिक्स, ड्रोन, स्टार्टअप, EV, सेमीकंडक्टर और रोजगार की बात है। यह वही शब्दावली है जिसमें आज की युवा पीढ़ी अपने भविष्य को देखती है। इस लिहाज से यह कहना गलत नहीं होगा कि सरकार Gen Z की बदलती प्राथमिकताओं के साथ संवाद का नया पुल बनाने की कोशिश कर रही है। मोहन यादव का 6 अक्टूबर का कार्यक्रम भीड़ जुटाने के लिहाज से सफल हो सकता है। 20 हजार युवाओं का एक मंच पर आना अपने आप में बड़ा आयोजन है। लेकिन इसकी असली सफलता इस बात से तय होगी कि इस मंच से निकली बातें अगले छह महीने या एक साल में कितनी जमीन पर दिखाई देती हैं।मुख्यमंत्री डा मोहन यादव की यह पहल बड़ी सफलता भले हासिल न कर पाए लेकिन सीएम अगर दिल से युवाओं के मन को पढ़ पाने में सफल रहे तो एक बड़ी चुनौती से सरकार सहजता के साथ पार पा लेगी।

लेकिन सिर्फ भाषा बदलने से भरोसा नहीं बनता।

युवा यह देखेगा कि AI की प्रदर्शनी के बाद उसे नौकरी कहां मिलेगी? स्टार्टअप की जानकारी के बाद पूंजी और बाजार तक उसकी पहुंच कितनी आसान होगी? कौशल प्रशिक्षण के बाद रोजगार मिलेगा या नहीं? सरकारी भर्ती समय पर होगी या नहीं? प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता कितनी होगी?यही वे सवाल हैं जो किसी भी युवा संवाद की सफलता तय करेंगे।

क्या युवा सरकार की बात से सहमत होगा

युवा किसी एक राजनीतिक दल या विचारधारा का स्थायी समर्थक नहीं है। उपलब्ध सर्वेक्षण संकेत देते हैं कि मुद्दे उसके निर्णय में बड़ी भूमिका निभाते हैं। सोशल मीडिया भी उसकी राजनीतिक समझ को प्रभावित करता है, लेकिन परिवार अब भी भरोसे का सबसे बड़ा स्रोत बना हुआ है। इसलिए सरकार का मंच युवाओं तक पहुंचने का माध्यम जरूर बन सकता है, लेकिन उसे स्वतः समर्थन में बदल देना संभव नहीं है। बल्कि इस तरह के कार्यक्रम सरकार के लिए दोधारी तलवार भी हो सकते हैं। यदि मुख्यमंत्री युवाओं के सवालों का सीधा सामना करते हैं, तो यह भरोसा बढ़ा सकता है। लेकिन यदि कार्यक्रम केवल योजनाओं और उपलब्धियों की प्रस्तुति बनकर रह जाता है, तो सोशल मीडिया के दौर में युवा उसकी आलोचना भी उतनी ही तेजी से करेगा।

भाजपा-संघ के लगातार कार्यक्रमों का असर

इन कार्यक्रमों का पहला असर यह होगा कि युवा अब राजनीति के केंद्र में और ज्यादा मजबूती से आएगा। राजनीतिक दलों को अपने भाषण, संगठन और डिजिटल रणनीति बदलनी पड़ेगी। दूसरा असर यह हो सकता है कि भाजपा और संघ युवाओं के बीच अपनी वैचारिक पहुंच को और व्यापक करें। संघ से जुड़े संगठनों की ओर से स्कूलों और युवाओं के बीच संवाद बढ़ाने की खबरें भी सामने आई हैं। लेकिन इसका उलटा प्रभाव भी संभव है। अगर युवा यह महसूस करता है कि उसके वास्तविक सवालों के जवाब देने के बजाय उसे केवल राजनीतिक रूप से प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है, तो वह और ज्यादा मुखर हो सकता है। Gen Z की खासियत ही यही है कि वह संवाद चाहता है, लेकिन एकतरफा संवाद नहीं। वह सुनना चाहता है, पर जवाब भी देना चाहता है। वह सम्मान चाहता है, लेकिन सवाल पूछने का अधिकार भी अपने पास रखना चाहता है।

असली परीक्षा मंच के बाद शुरू होगी

यदि युवाओं को बेहतर कौशल प्रशिक्षण, पारदर्शी भर्ती, नए रोजगार, स्टार्टअप सहायता और तकनीकी शिक्षा के अवसर मिलते हैं, तो सरकार का यह संवाद भरोसे में बदल सकता है। अगर ऐसा नहीं होता, तो यह कार्यक्रम भी बाकी राजनीतिक आयोजनों की तरह एक दिन की सुर्खी बनकर रह जाएगा।दरअसल, आज का युवा केवल ‘युवा संवाद’ नहीं चाहता, वह ‘युवा जवाब’ भी चाहता है।भाजपा और संघ ने Gen Z की ताकत को पहचान लिया है। कांग्रेस भी इस वर्ग के मुद्दों को राजनीतिक बहस का हिस्सा बना रही है। अब मध्यप्रदेश सरकार के सामने चुनौती यह है कि वह युवाओं को केवल मतदाता के रूप में नहीं, बल्कि नीति-निर्माण में भागीदार के रूप में देखे। क्योंकि आने वाले समय की राजनीति में सवाल यह नहीं होगा कि किस दल ने युवाओं के लिए सबसे ज्यादा कार्यक्रम किए। सवाल यह होगा कि किसने युवाओं की बात सबसे ज्यादा सुनी और उनके सवालों का सबसे विश्वसनीय जवाब दिया।यही 6 अक्टूबर के युवा संवाद की सबसे बड़ी राजनीतिक परीक्षा भी होगी।