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नई दिल्ली, 30 मई। दुनिया में तमाम देशों के बीच मचे घमासान का असर फलों पर भी पड़ रहा है। फलों का आयात निर्यात दुनिया की अन्य समस्याओं के जाल में उलझकर प्रभावित हो रहा है। जापान जैसे विकसित देश ने इस बार भारत के आमों के आयात पर रोक लगा दी। जापान ने करीब 20 साल बाद भारत से आमों के आयात पर अस्थायी प्रतिबंध लगा दिया है | यह रोक भारतीय केंद्रों पर वेपर हीट ट्रीटमेंट‘ (VHT) और फ्यूमिगेशन (कीट नियंत्रण) मानकों में खामियां पाए जाने के बाद लगाई गई है। जापानी अपनी पसंद के भारतीय आमों का स्वाद नहीं चख सकेंगे। इस प्रतिबंध का कारण ऊपरी तौर पेस्ट कंट्रोल प्रक्रिया में खामी बताया जा रहा है, लेकिन माना जा रहा है कि यह कदम युद्ध में विभिन्न देशों की व्यस्तताओं के चलते उठाया गय़ा है।

भारत दुनिया का सबसे बड़ा आम उत्पादक देश है। देश में आमों की तरह-तरह की किस्में हैं, जिनके स्वाद के मुरीद दुनिया के बहुत से देश हैं इनमें से एक जापान भी है। लेकिन इस साल जापान में रहने वाले लोग आम का स्वाद नहीं चख पाएंगे। जापान ने इस साल भारतीय आमों के आयात पर रोक लगा दी है। जापानी अधिकारियों का कहना है कि पेस्ट कंट्रोल की प्रक्रिया में कमी दिखने पर यह कदम उठाया गया। इससे पहले अस्सी के 1980 के दशक में भी जापान ने भारत से आम खरीदना बंद कर दिया था। यह एहतियाती बैन था। असल में जापान को डर था कि भारत में फल पर लगने वाले कीड़ों के साथ अंडे या लार्वा उनके यहां पहुंच जाएंगे, जिससे जापान में खेती को नुकसान हो सकता है। लगभग दो दशक बाद भारतीय आमों के लिए जापान के दरवाजे खुले लेकिन इतिहास फिर खुद को दोहराता दिख रहा है।दो दशक बाद जापान ने भारत के आमों का आयात रोक दिया है। जापान ने भारत की ट्रीटमेंट सुविधाओं में गड़बड़ियां पाने के बाद यह फ़ैसला लिया गया। दरअसल, हर साल आम के मौसम से जापान अपने कुछ निरीक्षकों को दिल्ली भेजता है। ये अधिकारी एक ख़ास प्रोसेस के ज़रिये इनकी जांच करते हैं। इसे वेपर हीट ट्रीटमेंट कहते हैं। यह आमों को कीड़ों और उनके अंडों से सुरक्षित बनाने की प्रक्रिया है। इसमें फलों को कुछ समय के लिए गर्म हवा वाले चैंबर में रख जाता है। इससे फल के अंदर मौजूद कीड़े और लार्वा खत्म हो जाते हैं।

इस साल निरीक्षण के दौरान आमों के ट्रीटमेंट की प्रक्रिया में कमियां पाई गईं।इसके बाद जापान की योकोहामा प्लांट प्रोटेक्शन एसोसिएशन ने एक नोटिफ़केशन जारी करते हुए भारतीय आमों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।एसोसिएशन ने यह भी कहा कि भारत से आने वाले आमों का इंपोर्ट तब तक रुका रहेगा, जब तक कि जापानी अधिकारी पूरी तरह से संतुष्ट नहीं हो जाते।यह पूरा मामला ऐसे समय पर सामने आया है जब आम का पीक सीजन है।एक्सपोर्टर पहले से कई देशों में चल रहे तनाव की वजह से प्रभावित हैं।समुद्री रास्तों में आई रुकावटों की वजह से शिपिंग इंश्योरेंस बढ़ गया है। इसकी वजह से जहाज कंपनियों की लागत बढ़ गई है। इसका असर आम ही नहीं दूसरी चीज़ों के निर्यात पर भी पड़ सकता है।

भारत आम का सबसे बड़ा उत्पादक है। एग्रीकल्चर एंड प्रोसेस्ड फूड प्रोडक्ट्स एक्सपोर्ट डेवलपमेंट अथॉरिटी (एपीईडीए) के आंकड़ों के मुताबिक, भारत दुनिया के कुल आम उत्पादन का लगभग 40 से 45 प्रतिशत पैदा करता है। यहां करीब 1000 किस्म के आम मिलते हैं। इनका बड़ा हिस्सा देश के भीतर ही खप जाता है। उत्तर से लेकर दक्षिण तक आम की अलग-अलग किस्में और स्वाद हैं। ताजे फल के अलावा इसे कई तरह से प्रिजर्व भी किया जाता है। इसके चलते सबसे बड़ा उत्पादक होने के बाद भी आम का निर्यात ज़्यादा नहीं रहा।एपीईडीए के मुताबिक, देश ने साल 2024-25 में करीब तीस हज़ार टन ताजे आमों का निर्यात किया। इनमें से सबसे ज़्यादा फल यूएई, अमेरिका, ब्रिटेन, कुवैत और क़तर को भेजे गए। जापान और भारत के बीच हुए समझौते के अनुरूप कुछ ख़ास किस्म के आम बाहर भेजे जाते रहे, जिनमें अलफ़ांसो, केसर, बंगनापल्ली, लंगड़ा, चौसा और मलिका हैं। अलफांसो को वैसे भी काफ़ी पसंद किया जाता रहा है। महाराष्ट्र के रत्नागिरी और देवगढ़ में पैदा होने वाला यह आम अपने स्वाद, खुशबू और गूदे की वजह से अलग पहचान रखता है। जापानी बाज़ार में यह किस्म लग्ज़री की तरह देखी जाती थी, जिस पर अब अनिश्चित वक्त के लिए विराम लग चुका है। अलग-अलग ट्रेड रिपोर्ट्स के मुताबिक़, जापान को भारत से आमतौर पर कुछ सौ टन से लेकर लगभग दो हजार मीट्रिक टन तक आम सालाना भेजा जाता रहा। यह कुल एक्सपोर्ट का एक प्रतिशत से भी कम हिस्सा माना जाता है।