खरी खरी संवाददाता

नई दिल्ली। लोकसभा की एक समिति ने इस साल मार्च में दिल्ली हाईकोर्ट के तत्कालीन जज जस्टिस यशवंत वर्मा के सरकारी आवास पर आग लगने के दौरान भारी मात्रा में नगद राशि जलने की घटना को सही माना है। आरोपों की जांच के लिए गठित समिति ने अपनी रिपोर्ट संसद के दोनों सदनों में पेश कर दी है।

रिपोर्ट में समिति ने ये निष्कर्ष निकाला है कि जस्टिस वर्मा के ख़िलाफ़ बिना हिसाब वाली नकदी, सबूतों से छेड़छाड़ और संतोषजनक जवाब नहीं देने के आरोप ‘साबित’ होते हैं। ‘जजेज़ (इंक्वायरी) एक्ट’ के तहत गठित तीन सदस्यीय समिति ने कहा कि जस्टिस वर्मा अपने सरकारी आवास के स्टोर रूम में मिली नकदी की मौजूदगी, उसके स्रोत या मालिकाना हक को लेकर संतोषजनक जवाब देने में नाकाम रहे। समिति ने यह भी कहा कि महत्वपूर्ण सबूतों को सुरक्षित नहीं रखा गया। साथ ही कानूनी तरीके से सील करने और निरीक्षण से पहले स्टोर रूम में मौजूद सबूतों की स्थिति को बदल दिया गया। यह रिपोर्ट दो खंडों में तैयार की गई है, जिसमें जांच के दौरान दर्ज मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्य शामिल हैं। तीन सदस्यीय जांच समिति ने मई में अपनी रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को सौंप दी थी। लाइव लॉ के मुताबिक गवाहों ने इन्हें जले, आधे जले, गीले और बिखरे हुए नोटों के बंडल, ढेर और गड्डियों के रूप में बताया।

दिल्ली फायर सर्विस और पुलिस के कई कर्मचारियों ने नोटों को देखने की गवाही दी। तस्वीरों और इलेक्ट्रॉनिक सामग्री से भी उनके बयानों की पुष्टि हुई। समिति ने कहा कि स्टोर रूम में कुल कितनी नकदी मिली ये तय करना मुमकिन नहीं है क्योंकि नोटों को सुरक्षित नहीं रखा गया।समिति ने रिपोर्ट में कहा कि सरकारी आवास पर बड़ी मात्रा में नकदी मिलना यह साबित स्थापित करता है कि जज का उस परिसर पर पूरा नियंत्रण था।लाइव लॉ के मुताबिक समिति ने कहा, “जो बात स्थापित हुई है, वह यह है कि जज के कब्जे वाले सरकारी परिसर में बड़ी मात्रा में ऐसी नकदी मिली जिसका कोई संतोषजनक हिसाब नहीं दिया गया था। स्टोर रूम उस परिसर का हिस्सा था और जज उसकी मौजूदगी, स्रोत या मालिकाना हक को लेकर संतोषजनक जवाब देने में नाकाम रहे।

दिल्ली हाई कोर्ट जज जस्टिस यशवंत वर्मा के आवास के एक स्टोर रूम में  14 मार्च को आग लगी थी, जहाँ पर कथित तौर पर उनके घर से बड़ी मात्रा में कैश मिला था।इसके बाद 22 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट के मौजूदा चीफ़ जस्टिस डीके उपाध्याय की रिपोर्ट और जस्टिस यशवंत वर्मा के बचाव संबंधी एक रिपोर्ट जारी की।इस रिपोर्ट में दिल्ली पुलिस द्वारा दी गई कुछ फ़ोटो और वीडियो भी शामिल हैं जिसमें जले हुए नोट नज़र आ रहे हैं। हालांकि, रिपोर्ट के कुछ हिस्सों को ‘रिडेक्ट’ किया गया था, यानी काले रंग से छिपाया गया था।जस्टिस वर्मा पर आरोप लगे कि नई दिल्ली स्थित उनके आधिकारिक निवास से भारी मात्रा में नकदी मिली थी।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चीफ़ जस्टिस संजीव खन्ना ने दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ़ जस्टिस डीके उपाध्याय को एक प्रारंभिक पूछताछ करने को कहा था।जस्टिस डीके उपाध्याय ने अपनी चिट्टी में चीफ़ जस्टिस संजीव खन्ना को कहा है कि इस मामले में एक ‘गहरी जांच’ की ज़रूरत है।वहीं, जस्टिस यशवंत वर्मा ने दावा किया है कि स्टोर रूम में उन्होंने या उनके परिवार वालों ने कभी कैश नहीं रखा, और उनके ख़िलाफ़ साज़िश रची जा रही है।

तत्कालीन सीजेआई जस्टिस संजीव खन्ना ने मामले की जांच के लिए तीन जजों की कमिटी बनाई। साथ ही यह फ़ैसला लिया है कि जस्टिस यशवंत वर्मा को कुछ समय तक कोई न्यायिक ज़िम्मेदारी न सौंपी जाए।सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने प्रस्ताव दिया कि जस्टिस वर्मा को दिल्ली से हटाकर वापस इलाहाबाद हाई कोर्ट भेज दिया जाए। हालांकि, इलाहाबाद हाई कोर्ट बार एसोसिएशन ने फैसले पर आपत्ति जताई थी।जिस इलाहाबाद हाई कोर्ट बार एसोसिएशन ने जस्टिस वर्मा का विरोध किया, कभी वह इस एसोसिएशन का हिस्सा थे। 6 जनवरी 1969 को इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में जन्मे जस्टिस यशवंत वर्मा तीस साल से भी ज़्यादा लंबे समय से क़ानूनी पेशे से जुड़े रहे हैं। करीब 200 सांसदों ने संसद के माध्यम से उन्हें पद से हटाने की मांग की थी। इसके बाद जस्टिस वर्मा ने इस्तीफ़ा दे दिया।