खरी खरी संवाददाता

तिरुअनंतपुरम। केरल के मलयालम भाषा विधेयक 2025 को लेकर कर्नाटक समेत कई जगहों पर विवाद खड़ा हो गया है। आरोप यह लग रहा है कि यह कानून दूसरी भाषाओं पर जबरन मलयालम थोपेगा। ऐसे में बढ़ते विवाद को देखते हुए मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने अपनी प्रतिक्रिया दी।

उन्होंने इन सभी दावों को खारिज करते हुए इस विधेयक को लेकर जो आशंकाएं जताई जा रही हैं, वे तथ्यों पर आधारित नहीं हैं। उन्होंने कहा कि केरल विधानसभा द्वारा पारित यह कानून पूरी तरह समावेशी है और इसमें भाषाई अल्पसंख्यकों के अधिकारों की विशेष सुरक्षा की गई है।सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट में मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने कहा कि केरल की प्रगति हमेशा समानता, भाईचारे और समग्र विकास पर आधारित रही है। राज्य सरकार धर्मनिरपेक्षता और बहुलतावाद जैसे संवैधानिक मूल्यों को पूरी मजबूती से बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है।विजयन ने स्पष्ट किया कि मलयालम भाषा विधेयक में एक साफ और मजबूत प्रावधान (धारा 7) शामिल है, जो भाषाई अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करता है। खासतौर पर कन्नड़ और तमिल भाषी समुदायों के हितों को सुरक्षित रखा गया है। उन्होंने कहा कि सरकार किसी भी नागरिक पर कोई भाषा थोपने के पक्ष में नहीं है और भाषाई विविधता की रक्षा करना उसकी प्राथमिकता है। मुख्यमंत्री ने बताया कि जिन क्षेत्रों को अधिसूचित किया गया है, वहां तमिल और कन्नड़ भाषी लोग सचिवालय, विभागाध्यक्षों और स्थानीय कार्यालयों से अपनी मातृभाषा में पत्राचार कर सकते हैं। इतना ही नहीं, उन्हें जवाब भी उसी भाषा में दिया जाएगासरी ओर शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर उठाई गई चिंताओं को लेकर खासकर कासरगोड जिले में कन्नड़ माध्यम के स्कूलों को लेकर पिनराई विजयन ने कहा कि जिन छात्रों की मातृभाषा मलयालम नहीं है, वे राष्ट्रीय शिक्षा पाठ्यक्रम के अनुसार स्कूलों में उपलब्ध भाषाओं में से अपनी पसंद की भाषा चुन सकते हैं। उन्होंने साफ किया कि अन्य राज्यों या विदेशी छात्रों को कक्षा 9, 10 या उच्च माध्यमिक स्तर पर मलयालम की परीक्षा देने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा।