बांगलादेश में चुनाव की घोषणा चुनौती बन गई

खरी खरी डेस्क

ढाका। बांग्लादेश में अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार प्रोफेसर मोहम्मद यूनुस ने अगले साल अप्रैल के पहले दो हफ्ते में चुनाव करवाने की घोषणा की है। लेकिन मोहम्मद यूनुस के इस फैसले पर ख़ालिदा ज़िया की बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) और समान विचारधारा वाली पार्टियों ने निराशा जाहिर की है। लेकिन अगर सभी दल चुनाव की तारीखों का समर्थन भी करें तो ये सवाल है कि अंतरिम सरकार को चुनाव करवाने में किन चुनौतियों का सामना करने पड़ेगा। खासकर राजनीतिक आम सहमति के अलावा यह भी सवाल है कि क्या देश का चुनाव आयोग इतने कम समय में मतदाता सूची को अंतिम रूप देने और निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन जैसे जटिल कार्यों को कर पाएगा? मोहम्मद यूनुस ने राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में कहा, “हमने इतिहास में सबसे अधिक स्वतंत्र, निष्पक्ष, प्रतिस्पर्धी और विश्वसनीय चुनाव कराने के लिए सभी दलों के साथ बातचीत की है।” हालांकि, उन्होंने जिस समय चुनाव की घोषणा की है उस पर विवाद हैं। आरोप लग रहे हैं कि उन्होंने समय तय करते समय देश के ज्यादातर राजनीतिक दलों की राय को नज़रअंदाज़ किया। मुख्य सलाहकार की अगुवाई वाले नेशनल कंसेंसस कमीशन के उपाध्यक्ष प्रोफेसर अली रियाज का कहना है कि यदि राजनीतिक दलों का सहयोग जारी रहा तो अगले महीने के भीतर ‘जुलाई चार्टर’ सहित सुधार कार्यक्रमों को अंतिम रूप देना संभव होगा। मोहम्मद यूनुस ने अपने भाषण में कहा कि जुलाई चार्टर के अनुसार तत्काल सुधार के कामों को लागू करने के अलावा बाकी बचे जरूरी कामों की ओर भी आगे बढ़ेंगे। एक्सपर्ट्स का कहना है कि अब सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती सभी दलों को एकजुट करना होगा। साथ ही विश्वास का माहौल बनाना भी एक चुनौती है जैसे शेख़ हसीना सरकार के विरोध में हुए प्रदर्शनों के दौरान हुआ हत्याओं के मामलों का फ़ेयर ट्रायल करवाना। क्सपर्ट्स का कहना है कि उन्हें ये विश्वास पैदा करना होगा कि सरकार निष्पक्ष चुनाव और समान अवसर के लिए माहौल बना सकती है।

एक्सपर्ट्स का यह भी मानना ​​है कि सरकार के सामने कई चुनौतियां होंगी, जैसे कानून-व्यवस्था स्थापित करना, पुलिस सहित विभिन्न संस्थाओं को स्वतंत्र रूप से काम करने में सक्षम बनाना, गैर-विवादास्पद मतदाता सूची बनाना, निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन पुराने कानून के आधार पर होगा या नए कानून के आधार पर। सवाल ये भी है कि क्या नए कानून के आधार पर इतने कम समय में इतने मुश्किल कामों को कर पाना मुमकिन है?ढाका यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर और राजनीतिक विश्लेषक जुबैदा नसरीन का कहना है कि सरकार के लिए असली चुनौती यह विश्वास हासिल करना होगा कि वे तटस्थ रहते हुए निष्पक्ष और समावेशी चुनाव कराना चाहते हैं। उन्होंने कहा, “राजनीतिक क्षेत्र में एक या दो दलों के प्रति उनके पक्षपातपूर्ण व्यवहार को लेकर पहले ही सवाल उठ चुके हैं। अगर इसका समाधान नहीं किया गया तो कानून-व्यवस्था और चुनाव-केंद्रित संस्थाएं स्वतंत्रता से काम कर सकें, ये सुनिश्चित कराना एक और बड़ी चुनौती होगी।” बीएनपी पहले ही सरकार की निष्पक्षता पर सवाल उठा चुकी है और दो सलाहकारों के इस्तीफे की मांग पर अड़ी हुई है। इस बीच, जमात-ए-इस्लामी के अमीर शफ़ीकुर रहमान ने आशंका ज़ाहिर की है कि आगामी चुनावों में धांधली हो सकती है। शनिवार को मौलवीबाजार में एक कार्यक्रम में बोलते हुए उन्होंने कहा कि देश ऐसा कोई चुनाव नहीं चाहता जो अव्यवस्था के साए में हो।

 

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